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Saturday, June 30, 2018

एक ऐसा गांव, जहां अध‍िकतर लोगों का डेट आॅफ बर्थ है 1 जनवरी

एक ऐसा गांव, जहां अध‍िकतर लोगों का डेट आॅफ बर्थ है 1 जनवरी



यहां तक क‍ि माता-प‍िता और सास-बहू का जन्मद‍िन भी आधार कार्ड में एक जनवरी ही दर्शाया गया है।







यूपी के यमुनापार स्थ‍ित जसरा ब्लॉक के कंजासा एक ऐसा गांव है, जहां करीब 80 लोगों का डेट ऑफ ब‍र्थ एक जनवरी है। माता-प‍िता और सास-बहू का जन्मद‍िन भी आधार कार्ड में एक जनवरी ही दर्शाया गया है। 







मामला सामने आने के बाद ग्राम प्रधान ने इसकी श‍िकायत डीएम और सीडीओ से की है। वहीं, गांव के लोगों ने दोष‍ियों के ख‍िलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।








कंजासा गांव के ग्राम प्रधान राम दुलारी मांझी ने बताया क‍ि राज्य सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में म‍िड-डे-म‍ील और स्कॉलरश‍िप जैसी योजनाओं के ल‍िए आधार कार्ड अन‍िवार्य कर द‍िया है।





इसके ल‍िए स्कूल के टीचर्स कंजासा के स्टूडेंट्स के आधार नंबर और इससे जानकार‍ियां जुटा रहे थे। इस दौरान उन्हें पता चला क‍ि आधार कार्ड में सभी का डेट ऑफ बर्थ एक जनवरी है, जबक‍ि साल अलग-अलग है।

-यही नहीं, जांच के दौरान ये भी पता चला क‍ि बच्चों के माता-प‍िता का भी जन्मत‍िथ‍ि एक जनवरी ही दर्ज क‍िया गया है।










राम दुलारी ने बताया, ''आधार कार्ड में मेरा डेट ऑफ बर्थ 1 जनवरी 1959 है, जबक‍ि मेरी बहू मीनू मांझी की डेट ऑफ बर्थ 1 जनवरी 1999 दर्ज कि‍या है।''
-इसी तरह गांव के रवि की जन्म तिथि भी 1 जनवरी 1981, सुनील निषाद की 1 जनवरी 1987, रवि निषाद की 1 जनवरी 2002, निरंजना निषाद की 1 जनवरी 1990 दर्ज कर दी गई है।






उन्होंने बताया क‍ि गांव के करीब सभी लोगों की जन्मतिथि एक ही तारीख में दर्ज होने से प्रशासन में भी हड़कंप मचा हुआ है। यहां की आबादी 10 हजार है, ज‍िसमें करीब 8 हजार लोगों का डेट ऑफ बर्थ आधार कार्ड में एक जनवरी है।

-यह प्रशासन की घोर लापरवाही है। इसकी शिकायत संबंधित अधिकारियों से की गई है। अधिकारियों ने आश्वस्त किया है कि गांव में फिर से शिविर लगाकर इसे सुधरवाया जाएगा।









एसडीएम राजकुमार द्विवेदी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में ज्यादातर लोगों को अपनी डेट ऑफ बर्थ नहीं पता होती है। आधार कार्ड बनाने वाले लोग उनकी आयु पूछे और फिर उसी आधार पर 1 जनवरी ल‍िखकर स‍िर्फ अलग-अलग साल बदलते गए, जबक‍ि डेट और मंथ नहीं बदला। इसी वजह से ये गड़बड़ी हुई है।





कैनुआ कंजासा गांव में करीब 10 हजार लोगों की आबादी है। जिन लोगों के आधार कार्ड बने हैं, उनमें 80 फीसदी में डेट ऑफ बर्थ की डेट और मंथ एक है। हालांक‍ि, ये कोई एक गांव का नहीं, बल्कि इस तरह की शिकायतें जारी, सोनवर्षा, पहाड़ी, खुझी समेत दर्जनों गावों में आई हैं।

 



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Tuesday, May 8, 2018

क्‍यों मिल कर भी नहीं मिलता इन महासागरों का पानी, संगम पर दिखते हैं दो रंग

क्‍यों मिल कर भी नहीं मिलता इन महासागरों का पानी, संगम पर दिखते हैं दो रंग



अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर मिलते हैं तो दोनों घुलमिल कर अपना वजूद नहीं खोते बल्‍कि दो अलग रंगों में साफ अलग नजर आते हैं।






दो महासागरों में दो रंग का पानी 


हमारी धरती के 70% हिस्से पर पानी ही पानी मौजूद है और इसका अधिकांश हिस्‍सा 5 महासागरों की अपनी अनंत सीमाओं के साथ पूरी पृथ्‍वी पर मौजूद है।








इन महासागर की सीमाओं और छोर को देख पाना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं है, लेकिन दो महासागरों की सीमायें ऐसी है जो आपस में मिलते हुए बिल्कुल साफ नजर आती हैं।







इसकी वजह यह है कि उनका पानी आपस में मिलता नहीं बल्कि अलग अलग नजर आता है। यह नजारा देखकर दुनिया दंग है 





और कुछ लोग तो इसे चमत्कार मानते हैं। वैसे इसकी असली वजह कुछ अलग और काफी दिलचस्‍प है।

अनोखा है दो महासागरों का ये संगम

इस दुनिया में मौजूद सात अलग-अलग महाद्वीप और उनके बीच फैले 5 अनंत महासागर हमारी धरती को विविधता और खूबसूरती प्रदान करते हैं। यह बात शायद आप जानते होंगे कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अलास्का की खाड़ी में एक दूसरे से मिलते हैं, लेकिन क्‍या आपको यह मालूम है कि इन दोनों के मिलन का यह नजारा दुनिया में सबसे अनोखा है, 







क्योंकि इन दो महासागरों का पानी आपस में घुलता मिलता नहीं बल्‍कि बिल्कुल अलग अलग रंगों का नजर आता है। यहां से गुजरने वाले पानी के जहाजों से यह नजारा साफ दिखता है और हैरान कर देता है। हिंद और प्रशांत महासागर की इस सीमा पर पानी के दो अलग-अलग रंग साफ नजर आते हैं। एक ग्‍लेशियर से आने वाला हल्‍का नीला पानी तो दूसरा दूर समंदर से आने वाला गहरा नीला पानी, साथ ही इन दोनो के मिलन स्‍थल पर झाग की एक दीवार साफ नजर आती है। इस जगह की कुछ शानदार तस्वीरें बीते कुछ सालों में इंटरनेट पर खूब वायरल हुई हैं।




क्‍यों दिखता है पानी अलग अलग 


वास्‍तव में इन दोनों महासागरो का पानी एक दूसरे से बिल्कुल अलग दिखने के पीछे एक खास वजह है। इस वजह का रिश्‍ता पानी के घनत्व और उसके तापमान समेत कई बातों से जुड़ा हुआ है। इन दोनों महासागरो के दिखने वाले अलग-अलग पानी को लेकर वैज्ञानिकों द्वारा अब तक तमाम शोध किए गए हैं और अंत में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस जगह पर खारे और मीठे पानी के अलग अलग घनत्व और उनमें मौजूद लवण और तापमान के अलग होने के कारण यह दोनों पानी आपस में पूरी तरह से मिल नहीं पाते। 











प्रशांत महासागर का पानी ग्‍लेशियर से आने के कारण हल्‍का नीला और नमक रहित होता है, जबकि हिंद महासागर का पानी काफी खारा होता है। समंदर की गहराई में भले ही दोनों महासागर का पानी पूरी तरह से तक मिल जाता हो लेकिन ऊपरी सतह पर इन दोनों के भिन्‍न घनत्‍व वाले पानी के टकराने से कुछ झाग पैदा होता रहता है और यह झाग पानी ऊपर सतह पर एक सीमारेखा की तरह नजर आता है। सूरज की रोशनी में खारे और मीठे पानी के अलग-अलग घनत्व के कारण दोनों पानी का रंग एक दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आता है।







कई और विचार भी रहते हैं चर्चा में

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के इस मिलन स्थल पर पानी की दीवार और अलग अलग रंगों के पानी का यह नजारा वाकई दुनिया को चौंकाने वाला है। कई बार तमाम लोग इसे चमत्कार मानते हैं तो कुछ लोग इसे कुछ धार्मिक मान्यताओं से भी जोड़ते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और यह दोनों महासागर कहीं ना कहीं जाकर तो आपस में पूरी तरह मिल ही जाते हैं बस समुद्र की ऊपरी सतह पर अलग अलग घनत्‍व वाले पानी के टकराने से पैदा होने वाली दीवार दोनों महासागरों के अलग होने का अनोखा और विस्मयकारी नजारा पेश करती है।




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न लाल किला बिका है, न ही बिकेगा ताज, अफवाहों पर न दें ध्यान

न लाल किला बिका है, न ही बिकेगा ताज, अफवाहों पर न दें ध्यान



बीते शनिवार को इस खबर के आने के थोड़ी देर बाद ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने कह दिया लाल किले को प्राइवेट हाथों में बेचा जाना ठीक नहीं है. लेकिन कम लोगों को पता है डेरेक ओ ब्रायन ने शुरुआती चरण में एडॉप्ट अ हेरिटेज स्कीम की तारीफ की थी. पिछले साल ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर पर बनी स्टैंडिंग कमेटी के हेड के तौर पर उन्होंने कहा था ये सरकार का स्वागत योग्य कदम है. सिर्फ इतना ही नहीं कमेटी की रिपोर्ट नंबर 59 में ये भी लिखा था कि सरकार को कॉरपोरेट हाउसेज पर दबाव डालना चाहिए कि वो किसी राष्ट्रीय धरोहर को जरूर गोद लें. लेकिन अब डेरेक ओ ब्रायन कह रहे हैं लाक किले को ‘बेचा’ जाना गलत है. और ये बेचा जाना वही है जिसकी उन्होंने वकालत की थी. मजेदार ये है कि जिस स्कीम की तब डेरेक ने तारीफ की थी उसमें कोई भी परिवर्तन सरकार द्वारा नहीं किया गया है.









करीब 8 महीने पहले केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा एक स्कीम लॉन्च की गई जिसका नाम था 'अडॉप्ट अ हेरिटेज' स्कीम. इस स्कीम के तहत देशभर के 100 ऐसे ऐतिहासिक स्थानों को चिह्नित किया गया जिसे किसी के द्वारा रखरखाव के लिए अडॉप्ट किया जाए. इस प्रक्रिया में कोई भी शरीक हो सकता है. इसके लिए सरकार की तरफ से ‘मॉन्यूमेंट मित्र’ का नाम लिया गया. इस लिस्ट में न केवल लाल किला और ताज महल बल्कि फतेहपुर सीकरी आगरा और कोणार्क का सूर्य मंदिर जैसे न जाने कितने धरोहर शामिल हैं.








लाल किले के बिकने की खबर पर हो हल्ला मचने के बाद पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने स्पष्ट बयान दिया, ‘मुझे नहीं पता ये आंकड़ा कहां से आया, क्योंकि पूरे समझौते में पैसों की कोई बात है ही नहीं. 25 करोड़ तो दूर की बात है, 25 रुपये क्या इसमें 5 रुपये तक की भी बात नहीं है. न कंपनी सरकार को पैसे देगी न ही सरकार कंपनी को कुछ दे रही है. जैसे पहले पुरातत्व विभाग टिकट देता था व्यवस्था वैसी ही रहेगी और बस पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ जाएंगी.’







पर्यटन मंत्रालय की तरफ से मीडिया में चल रही खबरों पर विज्ञप्ति भी जारी की गई. उसमें लिखा गया कि जो एमओयू साइन हुआ वो सिर्फ विकास कार्यों, लाल किले के इर्द गिर्द सुविधाएं बढ़ाने के लिए हुआ है. इसमें मॉन्यूमेंट के हैंड ओवर जैसी कोई बात ही नहीं है.

संभव है कि सरकारी तंत्र की तरफ से कुछ बातें इसके लिए गढ़ी जा रही हों लेकिन जब हमने इसके एडॉप्ट ए हेरिटेज स्कीम की वेबसाइट खंगाली तो वहां पर लीज पर देने या बेचने जैसी कोई बात सामने नहीं आई. इसके लिए इस स्कीम की गाइडलाइंस देखी जा सकती हैं. इसके भीतर सारे प्रावधान रखरखाव से संबंधित ही हैं. हां कंपनी को अपने प्रचार के लिए अपने ऐड लगाने की अनुमति जरूर नियमों में वर्णित है.







इस खबर के प्रकाशित होने के साथ ही ऐसा प्रदर्शित किया गया कि देश में ऐसा पहली बार हो रहा है और लोकतांत्रिक मूल्यों के किले ढहने शुरू हो गए. लेकिन ऐसा नहीं है कि इस तरह की कोई स्कीम पहली बार मोदी सरकार में ही आई है.


वेबसाइट स्क्रॉल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक 2007 में महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एडॉप्ट अ मॉन्यूमेंट स्कीम के तहत प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को पांच साल के ऐतिहासिक धरोहरों को गोद लेने की स्कीम शुरू की थी. बाद में 2014 में जब पृथ्वीराज चव्हाण राज्य के मुख्यमंत्री थे तब इस स्कीम को बढ़ाकर कांग्रेस की ही सरकार ने दस साल के लिए कर दिया था. इसका कारण था कि कंपनियों की तरफ से ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया गया.













इस स्कीम के तहत महाराष्ट्र के ओस्मानाबाद जिले के नालदुर्ग किले को यूनी मल्टीकॉन्स कंपनी ने अडॉप्ट किया था. इसके एवज में कंपनी को सरकार की तरफ से इस किले के नजदीक एक जमीन का एक टुकड़ा भी उपलब्ध कराया गया था जिस पर वह सैलानियों के रेजॉर्ट तैयार कर सके. कंपनी ने किले को बेहतर बनाने के लिए काम भी किए हैं जिनमें किले की सफाई, लॉन और सड़कों के काम शामिल हैं.





लेकिन अगर आप इस वक्त कांग्रेस के विरोध को सुनें तो वो बिल्कुल उल्टे प्रतीत होते हैं. केंद्र सरकार पर देश की धरोहर गिरवी रखने तक के आरोप लगा रहे हैं. विपक्ष का सरकार को आड़े हाथों लेना लोकतंत्र की सांसें चलते रहने के लिए बेहद जरूरी है लेकिन ऐसी आलोचना! जहां केंद्र में आपकी सरकार रहते आपकी ही पार्टी के एक मुख्यमंत्री ने वर्षों तक ये योजना चलाई?


यही नहीं 27 फरवरी 2014 को जब यूपीए सरकार के आखिरी दिन चल रहे थे तब कॉरपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट के मंत्रालय से जारी विज्ञप्ति को देखिए. इस विज्ञप्ति में कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिटी कार्यक्रम के नियम तय किए गए हैं. इस विज्ञप्ति की हेडिंग में यह भी लिखा गया है कि ये काफी मशक्कत के बाद तैयार किया गया है. क्या इसके नियम नंबर (e) में राष्ट्रीय धरोहरों के जीर्णोद्धार और रखरखाव की बात नहीं है?











और जब ऐसा है तो कांग्रेस और डेरेक ओ ब्रायन जैसे नेता किसको बरगलाना चाहते हैं? क्या ये लोग सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं? क्या अगर 2014 में एनडीए की बजाए एक बार फिर यूपीए की ही सरकार होती तो क्या सीएसआर नियम लागू नहीं होते? और क्यों न होते उनकी ही पार्टी के शासन वाले एक राज्य में आखिर ये स्कीम 7 सालों से चल रही थी.

यही नहीं यूपीए सरकार के दौरान ही 2013 में ओएनजीसी ने ताज महल को गोद लिया था. इसके अलावा ओएनजीसी द्वारा अजंता और एलोरा, हैदराबाद का गोलकोंडा किला, तमिलनाडु का महाबलिपुरम और सबसे अहम दिल्ली का लाल किला गोद लेने की योजना थी. जी हां, दिल्ली का लाल किला जिस पर फिलवक्त कांग्रेस पार्टी बेहद दुखी है.






दरअसल राष्ट्रीय धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव में प्राइवेट प्लेयर्स और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों के लिए दरवाजे खुलने का मामला 1996 में बनी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से शुरू होता है. जब कल्चर मिनिस्ट्री नेशनल कल्चरल फंड की स्थापना की थी. इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय धरोहरों की देखभाल के लिए पीपीपी मॉडल स्थापित करने का था. इसके लिए लिए चैरिटेबल एंडाउमेंट्स एक्ट, 1890 के तहत कंपनियों को कर में छूट देने की बात शामिल की गई.

इस बात को 22 साल बीत गए इस बीच न एनडीए और न ही यूपीए दोनों को ही इससे कोई परेशानी नहीं रही. 10 साल के यूपीए सरकार के दौरान सरकार और प्राइवेट शक्तियों के बीच कई एमओयू साइन हुए लेकिन कभी कोई हल्ला नहीं मचा.


 



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धोनी आखिर क्यों हैं क्रिकेट के सुपर कैप्टन

धोनी आखिर क्यों हैं क्रिकेट के सुपर कैप्टन



'अनहोनी को होनी कर दे जब खेल रहा हो धोनी।' यह जुमला अब इतनी बार सच साबित हुआ है कि अगर एमएसडी क्रीज पर हो तो हारने का तो सवाल ही नहीं होता। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्रसिंह धोनी निर्विवाद तौर पर भारत के सर्वश्रेष्ठ मैच फिनिशर में सबसे ऊपर खड़े नजर आते हैं।








इस बार आईपीएल के 11वें सीजन में 'माही फिर से मार रहा है' और इस कदर मार रहा है कि सामने वाली टीम के 200 रन भी कम काम पड़ रहे हैं।







अपने चिरपरिचित अंदाज में जब धोनी फिनिशिंग सिक्स लगाते हैं तो करोड़ों दिलों में उत्साह अपने चरम पर होता है, आप किसी भी टीम के समर्थक हो सकते हैं, लेकिन धोनी को धमाल मचाते देखने ही कुछ और है।






जब वे गगनचुंबी छक्के लगाते हैं तो आप खुद को उनके साथ जोड़ लेते हैं। छक्का लगाकर जीतना जहां धोनी की आदत बन चुकी है, वहीं धोनी भक्तों को भी इससे कम कुछ मजूंर नहीं।






चेन्नई सुपरकिंग्स की पीली जर्सी में चमकते एमएस धोनी जब खेलने उतरते हैं तो सामने कोई भी टीम हो, समर्थन धोनी को ही मिलता लगता है, मुंबई में पहले मैच में ही जब धोनी खेलने उतरे तो पूरे स्टेडियम में एक ही नाम गूंज रहा था- धोनी, धोनी, धोनी। और क्यों न गूंजे ये वे कप्तान हैं जिन्होंने भारतीय टीम के वे ख़्वाब सच कर दिखाए हैं, जो क्रिकेट के भगवान भी नहीं कर सके थे।











इसी शख्स ने सचिन तेंदुलकर को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में टीम इंडिया के कंधो पर बैठकर दुनिया के सामने क्रिकेट के महाकुंभ का खिताब जीत तिरंगा लहराने का 'हक' दिया था।







और जब स्थिति उनके मुताबिक़ नहीं रही तो उन्होंने बिना कुछ कहे-सुने कप्तानी को कह दिया गुडबॉय, कैप्टन कूल की इसी चौंकाने वाली अदा पर भी लाखों फ़िदा हैं। धोनी ने हमेशा सही समय पर सही काम कर दिखाया। उनके निर्णय क्रिकेट के बड़े-बड़े पंडितों के लिए बाउंसर रहे और उनके आलोचकों को हमेशा उन्होंने अपने बल्ले या सुपर कूल स्माइल जवाब देने वाले ने अपनी मर्जी से कप्तानी को राइट टाइम डिसीजन लेकर विदा कह दिया।










वैसे अधिकतर क्रिकेट कप्तान अपनी टीमों से लगभग हकाले गए हैं, वहीं धोनी के टेस्ट टीम से लिए संन्यास जैसे निर्णय अक्सर चौंकाने वाले ही रहे है। कुछ उन्हें किस्मत का धनी मानते हैं तो कुछ उन्हें टीम इंडिया का लकी चार्म मानते हैं और क्यों न हो रांची के इस साधारण से छोकरे ने अपनी काबिलियत से दो बार क्रिकेट की दुनिया पर फतह हासिल की है।







 हां, पिछले सीजन में पुणे से खेलते हुए उनका चिरपरिचित अंदाज नदारद रहा और टीम मैनेजमेंट और उनके मनमुटाव की खबरें भी आती रहीं, पर उन्होंने कभी खुद इस मामले पर कुछ नहीं कहा। उनका कूल अंदाज हर समय उनके साथ रहा और सबसे बड़ी बात अपने आलोचकों को अपने सुपर परफॉर्मेंस से लगातार चुप कराने वाला माही अभी भी मार रहा है वो भी जमकर।

 




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कलियुग को लेकर श्रीकृष्ण ने की थीं ये चौंकाने वाली भविष्यवाणियां!

कलियुग को लेकर श्रीकृष्ण ने की थीं ये चौंकाने वाली भविष्यवाणियां!



कई युगों से संस्कृत में लिखा गया यह धार्मिक ग्रन्थ मानवता का मार्गदर्शन करता आया है. धर्म क्या है, मोक्ष क्या है? क्या सही है क्या गलत है, इस धर्मग्रन्थ में सारे सवालों के जवाब है. श्रीमद्भागवत गीता को भगवान का गीत भी कहा जाता है. 







कहा जाता है, जब अर्जुन अपने रक्त संबंधियों को मारने को लेकर विचलित थे और उनके सामने एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया था, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन का मार्गदर्शन किया. भाग्वद्गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के इसी संवाद का वर्णन है.






इस धर्मग्रन्थ के अंतिम अध्याय में कलियुग को लेकर कुछ भविष्यवाणियां भी की गई हैं.





हालांकि ये भविष्यवाणियां श्रीकृष्ण द्वारा 5000 वर्षों पहले की गई थीं लेकिन आज ये सारी भविष्यवाणियां पूरी तरह सच साबित हो रही हैं. इतने वर्षों पहले लिखे ग्रन्थ में वर्तमान के बारे में जो भी बातें कही गई हैं, बिल्कुल सटीक बैठती हैं.





इसमें धरती के अंत को लेकर भी कई चौंकाने वाली भविष्यवाणियां हैं. आखिरी की स्लाइड्स में पढ़ें धरती के अंत के रहस्य...










श्रीमद् भागवतम 12.2.1: कलियुग में धर्म, सच्चाई, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवनकाल, शारीरिक बल और याद्दाश्त सब कुछ घटता चला जाएगा.






श्रीमद् भागवतम 12.2.2कलियुग में मनुष्य का केवल उसकी दौलत के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा. कानून और न्याय केवल किसी की शक्ति को देखते हुए लागू किया जाएगा.









श्रीमद् भागवतम 12.2.3पुरुष और स्त्रियां केवल बाहरी आकर्षण की वजह से साथ रहना शुरू कर देंगे. बिजनेस में सफलता धोखे और बेईमानी पर आधारित हो जाएगी. 






 श्रीमद् भागवतम 12.2.4-केवल बाहरी प्रतीकों से व्यक्तियों की आध्यात्मिकता सुनिश्चित की जाएगी. लोग एक आध्यात्मिक व्यवस्था से दूसरी आध्यात्मिक व्यवस्था को बदलते रहेंगे. एक शख्स की संपत्ति और प्रतिष्ठा पर सवाल उठाए जाएंगे अगर उसकी कमाई अच्छा नहीं होगी. जो शख्स शब्दों का खेल खेलने में कुशल होंगे, ऐसे लोगों का बोलबाला रहेगा. ऐसे ही लोगों को कलियुग में विद्वान समझा जाएगा.
 



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