चीन ही है भारत का सबसे बड़ा दुश्मन
बात कल या परसों की नहीं, बल्कि करीब दो दशक पुरानी है। मई 1998 में तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के रक्षामंत्री की हैसियत से समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडीस ने जब सामरिक दृष्टि सेयह दिलचस्प था कि संघ और वामपंथियों के रूप में दो परस्पर विरोधी विचारधारा वाली ताकतें इस मुद्दे पर एक सुर में बोल रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे दोनों ने अलग-अलग कारणों से 1942 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ
कई तथाकथित रक्षा विशेषज्ञों और विश्लेषकों समेत मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इसके लिए जार्ज की काफी लानतमलानत की थी। जार्ज आज भले ही शारीरिक अशक्तता तथा याददाश्त खो चुके होने के चलते मौजूदा राजनीतिक
यह वह समय था जब भारत को आजाद हुए महज 11 वर्ष हुए थे और माओ की सरपरस्ती में चीन की लाल क्रांति भी कुल नौ साल पुरानी ही थी। हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू तब समाजवादी भारत का सपना देख रहे थे, जिसमें चीन
उन्हीं दिनों चीन द्वारा जारी किए गए नक्शों से भारत को पहली बार झटका लगा। उन नक्शों में भारत के सीमावर्ती इलाकों के साथ ही भूटान के भी कुछ हिस्से को चीन का भू-भाग बताया गया था। चूंकि इसी दौरान भारत
ताजा विवाद के तहत चीन ने जिस तरह कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जा रहे भारतीय यात्रियों को रोका और भारतीय सैनिकों पर सिक्किम से लगी अपनी सीमा में घुसपैठ करने का आरोप लगाया, उससे लगता है कि वह भारत की
भारत-चीन के बीच ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब चीनी सेना ने भूटान के कब्जे वाले क्षेत्र में सड़क बनानी शुरू कर दी। भूटान से सुरक्षा संबंधी संधि के कारण भारत के सैनिकों ने स्वाभाविक रूप से बीच-बचाव किया, जो
चीन से इस तनातनी की कुछ वजहें कूटनीतिक भी हैं। दरअसल, चीन अपने को विश्व की एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने की कवायद में जुटा हुआ है। अपने पड़ोस में इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट उसे भारत ही नजर
यह सच है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि चीन की सैनिक ताकत हमसे कहीं ज्यादा है। उसने हमारी सीमाओं तक सड़कों का जाल भी बिछा लिया है। ल्हासा तक ट्रेन चलाकर भी
कई मोर्चों पर फंसा चीन ऐसे में भारत से युद्ध करेगा, ऐसा नहीं लगता। जो भी हो, पर यह तथ्य भी नहीं भूला जा सकता कि चीन अतिक्रमणकारी है। भारतीय भूमि पर उसकी ताजा गतिविधियां और युद्ध की धमकी एक बार फिर









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